क्या दहेज़ लेना उचित है
यकायक मेरे कदम रुके और मैं उस ओर चल पड़ा जहां से “जीने की राह” की आवाज़ आ रही थी। पुस्तक को हाथ में लेने से पहले ही मैंने पूछा क्या वाकई में “मैं दहेज देने से बच सकता हूं?” यह कहते हुए मैंने जैसे ही पुस्तक को हाथ में ले उसे पढ़ना चाहा संयोगवश मैं उसी पृष्ठ पर जा पहुँचा जहाँ लिखा था “बेटियां बोझ नहीं हैं। हम शादी विवाह में दहेज लेकर और देकर बहुत बड़ी समस्याओं से घिर चुके हैं। इसी गलत परंपरा के कारण हमें बेटी बोझ लगने लगी है।हमारी कुपरंपराओं ने बेटी को दुश्मन बना दिया। हमें समाज में फैली इस कुरीति को तुरन्त बन्द करना चाहिए !”
यह लाइनें पढ़कर मैं फूट – फूट कर रोने लगा और भाग कर मैंने अपनी लाडो को गले से लगा लिया और बोला बेटी माफ कर दे मुझे आज मैं बहुत बड़ा पाप करने जा रहा था!
चूँकि की पुस्तक में ना सिर्फ दहेज परंपरा की जानकारी थी बल्कि कर्ज़ से पूर्णत: छुटकारा एवं मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य की जानकारी भी शामिल थी। मैंने पुस्तक देने वाले भाई से पूछा इतने सुंदर विचार लिखने वाले लेखक का क्या नाम है?
वे बोले इस पुस्तक को संत रामपाल जी महाराज जी ने लिखा है। यह पुस्तक अब तक 50 लाख से अधिक लोग पढ़ चुके हैं!
यह सुनकर मुझे आशा की एक नई किरण दिखाई दी तो सोचा की यह आज मै क्या अनर्थ करने जा रहा था?
मैं पुस्तक खरीद कर घर की ओर चल पड़ा। मैं शैतान से इंसान बन चुका था और मन ही मन बोले जा रहा था
“बोलो संत रामपाल जी महाराज की जय हो!”
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