जन्म - मरण
- परमेश्वर कबीर जी ने अपने मन को सम्बोधित करके हम प्राणियों
को सतर्क किया है कि इस संसार में दो दिन का यानि थोड़े समय का मेहमान
है। इस थोड़े-से मानव जीवन में आत्म ज्ञान के अभाव से अनेकों पाप इकट्ठे करके
अनमोल मानव जीवन नष्ट कर जाता है। धन कमाने की विधि तो संसार के व्यक्ति
बता सकते हैं, परंतु गुरूदेव जी के बिना आत्म ज्ञान यानि जीव कहाँ से आया?
मनुष्य जीव का मूल उद्देश्य क्या है? सतगुरू धारण किए बिना यानि दीक्षा लिए
बिना जीव का मानव जन्म नष्ट हो जाता है। यह बात गुरू जी के बिना कोई नहीं
बताएगा। चाहे पृथ्वी का राजा भी बन जा, परंतु भविष्य में पशु जन्म मिलेगा।
जन्म-मरण का चक्र गुरू जी के ज्ञान व दीक्षा मंत्रा (नाम) बिना समाप्त नहीं हो
सकता। जब तक जन्म-मरण का चक्र समाप्त नहीं होता तो बताया है रहट के कूँए में लोहे की चक्री लगी होती है। उसके ऊपर
बाल्टियों की चैन वैल्ड की जाती है। उसको रहट कहा जाता था। पहले बैल या
ऊँट से चलाते थे, जैसे कोल्हू बैल-ऊँट से चलाते हैं। (पहले अधिक चलाते थे) रहट
की बाल्टियाँ नीचे कूँए से पानी भरकर लाती है। ऊपर खाली हो जाती है। यह चक्र
सदा चलता रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी रूपी कूँए से पाप तथा पुण्यों की बाल्टी
भरी ऊपर स्वर्ग-नरक में खाली की। इस प्रकार जन्म-मरण के चक्र में जीव सदा
रहता है। ऊपर के शब्द में यही समझाया है कि संसार में परिवार-धन सब त्यागकर
एक दिन अकेला चला जाएगा। फिर कहीं अन्य स्थान पर जन्म लेकर यही क्रिया
करके चला जाएगा। यदि आप घर से किसी अन्य शहर में जाते हैं तो जाने से पहले
निश्चित करते हो कि वहाँ जाऐंगे। उसके बाद कहाँ विश्राम करेंगे। परंतु संसार
छोड़कर जाते हो तो कभी विचार नहीं करते कि कहाँ विश्राम करोगे। हे जीव!
चौरासी लाख प्रकार के प्राणियों के शरीरों में प्रताड़ना सहन करता है। मरता-जीता
(नये प्राणी का जीवन प्राप्त करता) है। कभी राजा बनकर उच्च बन जाता है, कभी
कंगाल बनकर नीच कहलाता है। परमात्मा कबीर जी समझा रहे हैं कि अवतार गण
(राम, कृष्ण आदि-आदि) भी सत्य साधना न मिलने के कारण जन्म-मरण के चक्र
में पड़े हैं। सत्य साधना मेरे पास है। हे प्राणी! तू मेरे को पहचान, मैं समर्थ परमात्मा
Comments
Post a Comment