जैन धर्म
गीता अ. 16 श्लोक 9 में कहा है कि गलत साधना द्वारा अनमोल जीवन नष्ट कराने वाले (उग्रकर्माणः) क्रूरकर्मी सर्व बालों को नौंच-नौंचकर उखाड़ना, निःवस्त्र फिरना, गर्मी-सर्दी से शरीर को बिना वस्त्र पहने कष्ट देना, व्रत करने के उद्देश्य से कई-कई दिन तक भोजन न करना। फिर संथारा ( संथारा क्रिया -अन्न,जल आहार प्रतिदिन कम करते हुए निराहार रह कर मृत्यु को प्राप्त होना) द्वारा भूखे-प्यासे रहकर देहान्त करना आदि-आदि क्रूरकर्म हैं। ऐसे क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगत के नाश के लिए ही उत्पन्न होते हैं।
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