खराब शिक्षा स्तर
शिक्षा की गुणवत्ता के लिए शिक्षकों की क्षमता निर्माण के साथ-साथ उचित वातावरण महत्वपूर्ण है। अध्यापकों की कमी, सेवा में चुने जाने के बाद उनका विधिवत प्रशिक्षण और सेवाकालीन अध्यापकों के व्यावसायिक विकास और अध्यापन के स्तर को बढ़ाने, परिणामों के लिए उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने जैसे विषयों पर समय-समय पर राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार द्वारा बहुत कुछ कहा जाता रहा है। साक्षरता और स्कूली शिक्षा में सुधार के नाम पर स्कूल तो खुल गए लेकिन शिक्षा के स्तर में कोई खास अन्तर नहीं आया है बल्कि उल्टा गिरावट आयी है। 2010 से अवश्यक शिक्षा अधिनियम लागू होने से स्कूलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है और विशेषकर प्राथमिक स्कूलों की संख्या बढ़ी है।श्रेष्ठ एवं उत्तम पाठ्यक्रम की हालत तो और भी ज्यादा खतरनाक है। सरकारी स्कूलों में ढांचागत सुविधाओं की कमी और अध्यापकों की नाकामी के चलते हालत यह है जो अभिभावक खर्च वहन करने की स्थिति में है वह अपने बच्चों के सरकारी स्कूलों में पढ़ाना ही नहीं चाहता। प्राइवेट स्कूलों में लूट का आलम यह है कि वहां वर्दी से लेकर किताबें-कापियां तक भारी भरकम मूल्यों पर बेची जाती हैं और अभिभावकों को स्कूल द्वारा निर्धारित सप्लायर से ही किताबें-कापियां और वर्दी खरीदना पड़ती हैं। इन स्कूलों के बच्चों की हालत यह है कि नर्सरी के बच्चे जब स्कूल से निकलते हैं तो पीठ पर लादे बस्तों के बोझ के कारण उनसे चला भी नहीं जाता। प्राइवेट अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के पाठ्यक्रम में एलकेजी और केजी के बच्चों का पाठ्यक्रम दूसरी-तीसरी कक्षा के बच्चों के पाठ्यक्रम से भी कठिन है जिसके कारण इन स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों की बौद्धिक क्षमता घट रही है और व्यवहार उग्र हो रहा है। सरकारी स्कूल जहां कम शिक्षकों की समस्या से जूझ रहे हैं, वहीं निजी विद्यालय अनुचित पाठ्यक्रम चला रहे हैं आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।
न्यूनतम गुणवत्ता को सुनिशचित करने के लिए तौर तरीकों की एक संहिता बनाई जानी चाहिए जो स्कूल में लागू हो। शिक्षा के अधिकार कानून में भी इस तरह की संहिता का प्रावधान नहीं रखा गया है। इस कानून में ऐसा कोई ब्योरा नहीं है कि स्कूल में न्यूनतम किस स्तर की शिक्षा दी जाएगी। हालांकि गुणवत्ता बनाना एक जटिल प्रक्रिया होती है लेकिन ढांचागत सुविधाओं, अध्यापकों की संख्या, पढ़ाने के तरीके, शिक्षा के नतीजे जैसी कुछ शर्तें हैं जो हर प्राइवेट व सरकारी स्कूल के लिए अनिवार्य रूप से लागू होनी चाहिए।
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